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आज घनु घनु बरसू दे

Aaj Ghanu Ghanu Barasu

गजेंद्र अहिरे

आज घनु घनु बरसू दे
सप्तसुरांचे अमृत प्राशून देहभान हरपू दे

कालिंदी के तट पर कान्हा
बन्‍सी का है खेल रचायो
गाय बनूं इस पार मैं तरसूं
मृद्गंध ना सह पाऊं रे

आज अधिर मन तरसू दे
सप्तसुरांचे अमृत प्राशुन देहभान हरपू दे

बरसे बरसे मेघ अनावर
भिजले अंग गगनभर होई
श्यामल श्यामल दाटून येता
मनात निर्झर पाझर होई

आज मधुर मधु निरसू दे
सप्तसुरांचे अमृत प्राशुन देहभान हरपू दे