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प्रणतनाथ रक्षि कान्त

Pranatnath Rakshi Kant

वि. सी. गुर्जर

प्रणतनाथ ! रक्षि कान्त । करि तदीय असुख शांत ॥

अशुभा ज्या योजिं दैव । पतिंलागीं, त्या सदैव ।
परिणमवी मंगलांत ॥